Thursday, 6 April 2017

नन्हीं बिटियां


नन्हीं बिटियाँ  उछलती है
मचलती है
कहती है, मैं भी पढ़ूँगी।
ताल-तलैय्ये भरें हैं
बरखा के संग बैरी
बदरा जम के अड़े हैं,
पर नन्हीं बिटियां कहती है
अब मैं भी पढ़ूँगी।
आँगन है बुहारना
जहाँ , गुड़ियों के कपड़े सी-सी के
अम्मा खाट पर पड़ी है।
उसी खपरैल की छाँव में
नन्हीं बिटियाँ उछलती है
मचलती है ,
कहती है ,
मैं भी पढ़ूँगी।
कलम , दवात , स्याहियों
की लड़ाई है नयी ,
कबूतरों को दाना डालते ,
गौओं को खिलाते ,
गोबर के उपले बनाते ,
टुकुर-टुकुर ताक़ते
हौले से मुस्काते ,
नन्हीं बिटियाँ कहती है
मैं लड़ूंगी
अब मैं भी पढ़ूँगी।

Tuesday, 21 March 2017

मुलाक़ात

 एक फूल बहाने से छोड़ा था
तेरी किताब में कहीँ ,
की मुख़्तसर ही सही
मुलाक़ात तो होगी,
वायदे तो रह गए
किस्से-कहानियों से सभी,
एक शाम में कैद जिंदगी की
फिर से तलाश तो होगी.