Saturday, 6 February 2016

घर


सुकून के चन्द पल
आराम की वो घड़ियाँ
नरम चादरों में लिपटे हम
कहीं ये हमारा घर तो नहीं ?
बाग़ से आती सुर्ख गुलाबों की खुशबु
नाज़ुक हवाओं से चलते -थमते
तुम्हारे कदम ,
कहीं ये हमारा घर तो नहीं ?
बेवजह खनकती हंसी
ये बेपरवाह सी मुहब्बत ,
बारिश की पहली बूंदों सा
यूँ आगोश में आना तेरा ,
कही ये हमारा घर तो नहीं?
सुबह की रौशनी सा दाखिल हो
चूम के गालों को
नींद से जगाना तेरा ,
फिर रात की खुमारी सा
खुद भी सो जाना तेरा।
कही ये हमारा घर तो नहीं ?
मंदिर की घंटियाँ या सुबह की अजान
खुदा की इबादत में यूँ झुक जाना तेरा।
ये बेबाक चाहतें , फ़िक्रें सभी ,
तेरी हर दुआ में होना मेरा
कही ये मेरा घर तो नहीं !!