Sunday, 9 October 2016


जिंदगी कहती है  मेरी कहानी
मुठ्ठी भर ख्वाहिशें
 और मीलों से लंबी हैरानी ,
हैरान नहीं मैं की तू साथ क्यों नहीं
तेरे साथ का एहसास क्यों नहीं ,
हैरान हूँ ,
तुझे चाहने के जज़्बात क्यों हैं..
 साये से बचते हैं हमारे
साया बनके घूमते  थे जो
खुशबुओं सी  उड़ती है  फिज़ाओ में
 अब भी वो नज़्म की तरह।
 आज भी घेरते हैं मुझे
तेरी बाहों के घेरे ,
आंसुओं से  अपने,तेरे गालों को भिगोना याद है.
तस्वीर छुपा के रक्खी थी
एक  रोज़ आईने में ,
अब भी साथ है वो
पल्लू की गाँठ  तरह.









Tuesday, 13 September 2016

कितने दूर कितने पास

कितने दूर कितने पास
दो जिस्म एक जान ,
 बिन तेरे जिंदगी है तो नहीं ,
पर साथ तेरे वो बात भी नहीं।
बिखर जाएँगे मोतियों से
अगर खोल के रख दें ये दिल,
 खुद को समेट रख सकने को
ये दर्द अब जरूरी है.
मुश्किल कुछ हालात हैं
और मुश्किल जज़्बात भी,
 तुम्हें छोड़ दें या छीन लें
सबसे अभी.
दर्द का रिश्ता सही
 पर है बहुत गहरा ,
जी सकने को फिर से
ये एहसास जरुरी है.  

Monday, 15 August 2016

शहर

संभाल के जिसे नज़रों में
दूर बहुत निकल आये थे ,
वही रास्ते पूछते हैं ,
अब तेरा शहर कहाँ है?
चौराहे की अठखेलियां ,
नुक्कड़ों के वायदे  ,
मंज़िलों की धूल पूछती है
अब तेरा शहर कहाँ है?










Monday, 11 April 2016

क्या है वो


क्या है वो जो थम सा
गया है मुझमे ,
कोई  आहट सी है
जो दबे पाँव आती है
या कोई वहम।
कश्मकश आज भी वही है,
आज भी वही जुस्तजू
क्या है वो
जो थम सा गया है
मुझमे!


Saturday, 6 February 2016

घर


सुकून के चन्द पल
आराम की वो घड़ियाँ
नरम चादरों में लिपटे हम
कहीं ये हमारा घर तो नहीं ?
बाग़ से आती सुर्ख गुलाबों की खुशबु
नाज़ुक हवाओं से चलते -थमते
तुम्हारे कदम ,
कहीं ये हमारा घर तो नहीं ?
बेवजह खनकती हंसी
ये बेपरवाह सी मुहब्बत ,
बारिश की पहली बूंदों सा
यूँ आगोश में आना तेरा ,
कही ये हमारा घर तो नहीं?
सुबह की रौशनी सा दाखिल हो
चूम के गालों को
नींद से जगाना तेरा ,
फिर रात की खुमारी सा
खुद भी सो जाना तेरा।
कही ये हमारा घर तो नहीं ?
मंदिर की घंटियाँ या सुबह की अजान
खुदा की इबादत में यूँ झुक जाना तेरा।
ये बेबाक चाहतें , फ़िक्रें सभी ,
तेरी हर दुआ में होना मेरा
कही ये मेरा घर तो नहीं !!

Saturday, 9 January 2016

रवायतों में उलझ के दुनिया के
डूबती रहीं मुहब्बतें ,
दम तोड़ती रहीं
सिलसिलेवार ,
काफ़िर हसरतें हमारी.
ज़िक्र में तुम्हारी शामिल तो न हो सके
रागों में लहू बन दौड़ती रहीं
चाहतें तुम्हारी।
रूठ जाती हैं रातें
जो महसूस तुम्हें कर लें ,
अजनबी सी लगती हैं
अब करवटें हमारी।
सफर में हैं जिंदगी के यूँ ,
की कोने में यादों की खिड़की
खोल सी रक्खी  है,
की जब चाहे बाहों में भर ले तुम्हे,
छोड़ रक्खी हैं बिस्तरों में
सिलवटें तुम्हारी।