Wednesday, 20 February 2013

मैंने जीवन देखा है



मैंने जीवन देखा है
मृत्यु के भी पार कहीं
मैंने जीवन देखा है.
विषयों के शल्यों
से अविचलित
चेतना को देखा है
मैंने जीवन देखा है.
सत-असत  के मूलों में
निस्सार आवागमन के झूलों में
क्षितिज के पार पहुचते
यात्री को देखा है,
मैंने जीवन देखा है
मृत्यु के भी पार कहीं
मैंने जीवन देखा है।
अब न जन्मूँगा कभी 
तथागत के बोल बोलते
अस्ताचल के सूरज
का दर्प टूटते देखा है
मैंने जीवन देखा है
मृत्यु के भी पार कहीं
मैंने जीवन देखा है।

बड़ा दिखावटी मेला है



अजब रिश्तों का रेला है
भीड़ में हर इंसान अकेला है
किसी को किसी का गम नहीं
बड़ा दिखावटी मेला है
रंग बिरंगी झालरों सी
इंसान की फितरत यहाँ
नित नए रंग दिखाती
एक बनावटी ठेला है
बड़ा दिखावटी मेला है.
सब है बिकता यहाँ
जो भी दिखता  यहाँ
खरीदने बेचने का
एक नुमायशी खेला है
बड़ा दिखावटी मेला है.
है ख़ुशी मिलती यहाँ
हर ''आह'' का दाम लगाते
सौदागरों का अजब झमेला है
बड़ा दिखावटी मेला है. 

सावन



विकल विचल आहत  सा ये  मन
निर्झर झर झर बरसा सावन
पुष्पों पर अब तरुणाई है
ज्यों गंध पवन संग लायी है।
अट्टहास  करता है मेघा
कभी तो तुमने होगा देखा
कुछ छंद नए समुझाई है.
ज्यों गीत पवन संग लायी है।
लुक छुप  छुप-छुप चंचल यौवन
खेल नवीन खेले नयन
तितली पराग पर इठलाई है
ज्यों राग पवन संग लायी है।
इन्द्रधनुषी रंगों के मनभावन
झुरमुट से होकर
हर्ष की झालरें बिछवाई है
ज्यो हास पवन संग लायी है।   

Tuesday, 19 February 2013

अस्तित्व



चल सखी
निज प्रीत न छोड़ेंगें अब
अस्तित्व का मोल तोलेंगें अब
जिए बहुत इस दासता में
मूकता को तज
चल सखी बोलेंगें अब .
अब जो टूटेंगी वो होंगी
पीर की बेड़ियाँ
भेद हृदय के खोलेंगे अब
चल सखी बोलेंगे अब.
अब न सिसकेगी कोई
बदलेगी मृत रूढ़ियाँ
फिर खुले आसमाँ में
पंछियों की तरह
फक्र से डोलेंगे अब
चल सखी बोलेंगे अब.
न डरेगी न मरेगी
अब न जलेगी कोई
एकता और प्रेम के
रंग नए घोलेंगे अब
चल सखी बोलेंगे अब. 

Monday, 11 February 2013

अतीत की आसक्ति



अतीत की आसक्ति में
मैं मौन सी क्यों झूलती?
हर क्षण जीवन के
सफ़र को क्यों भला मैं तोलती ...
हो चली है सांझ
की उजाले अब सिमटने लगे हैं,
अन्तरंग में छिपाए
अँधेरे लिए क्यों भला मैं डोलती ...
अतीत की आसक्ति में
मैं मौन सी क्यों झूलती।
क्या खोया है, क्या पाया है
सब प्रारब्ध की छाया है
लिए पोटली स्मृतियों की
क्यों भला मैं खोलती ...
अतीत की आसक्ति में
मैं मौन सी क्यों झूलती?

लकीरें



लकीरें बनायीं है
लकीरें सजाई हैं
हर मोड़ पर हमने दुश्वारियां बिछवाई हैं
काटों के तारों से लगी
उम्मीद अब दम तोड़ती
अब कहाँ जाए कहती
राहें नयी है जोड़ती।
बारूद की छावँ  में
पल रहीं नस्लें सभी
सरहदों के दरम्यान
जिंदगी को मोड़ती।
सियासी दांव पेंचो में पड़ी
हुकूमते सभी
इंसानियत के सब्र के
हर बाँध हैं तोड़ती।
फ़सादी ताकतों को सींचती
दंगों पर आँखें मींचती
हर दायरों को छोड़ती।
लकीरें ...हमने बनायीं हैं
लकीरें ...हमने सजाई हैं।      
 

थकान



थक गया हूँ
चलते चलते
अब थोड़ा  हौसला चाहिए
हुआ बहुत  फासला
अब मुहब्बत का
एक सिलसिला चाहिए।
न मालूम
कितनी राहें चली
इस एक राह के लिए
कितने हाथ थामे
इस एक हाथ के  लिए,
टटोलते रहे
चला बहुत काफिला
अब मुहब्बत का
एक सिलसिला चाहिए।
जिंदगी से दूर हूँ
बहुत मजबूर हूँ
टूटती साँसों की
डोर कुछ थाम
सी रखी है,
खुद की खुद
से जुंग में
एक फैसला चाहिए।
थक गया हूँ
चलते चलते
थोडा हौसला चाहिए
हुआ बहुत फासला
अब मुहब्बत का
एक सिलसिला चाहिए।
 

कहानी



कहानी
बनती है बिगड़ती  है
सुलझती है, उलझती है
हर नए मोड़ पर
नए किरदार गढ़ती है
नए मकसद बनाती  है
नयी तस्वीर के आईने दिखाती है
नए अहसास बुनती है
नयी करवटें बदलती  है
नए फासले बनाती  है 
नयी नजदीकियाँ  जताती है।
नए झुरमुटों में छुपती है ,
नया आकाश दिखाती है
नए पंख पसारे
नयी राह चलती है।
कभी भटकती
कभी अटकती
कभी संभलती
सुलझती है
उलझती है
टूट जाती है
फिर बनती है
नए सिरे से उलझने के लिए
कहानी
बनती है,बिगड़ती  है।

तेरे बिना



तेरे बिना जिंदगी बेमानी सी लगती है
तेरे नाम की चिठ्ठियाँ
बेगानी सी लगती हैं,
तेरा आना तेरा जाना दुखाता नहीं अब दिल
दिल्लगी की ये बातें
पुरानी  सी लगती हैं।
मेहँदी लगे हाथों की खुशबु
नीली चूड़ियों की खन खन
तेरे चेहरे की वो ख़ुशी
सभी यादें एक कहानी सी लगती है
तेरे बिना
क्यों जिंदगी बेमानी सी लगती है।
वो अधूरी शाम
बितायी लिए हाथों में हाथ
आज भी बड़ी सुहानी सी लगती हैं।
वो जूनून
तेरी राह में पलकें बिछाने का
एक झलक पाने का
आज भी ये नज़र
कुछ दीवानी सी लगती है।
तेरे बिना
 क्यों जिंदगी बेमानी सी लगती हैं।
 

Friday, 8 February 2013

तेरे नाम



जिन्दगी की शाम हो गयी
फिर मेरी एक सुबह तेरे नाम हो गयी
फिर आँख के कोनों में ज़रा पानी सा है
फिर ये दास्ताँ
सरेआम हो गयी।
दौड़ पड़ती है नज़र
फिर उन्ही रास्तों की ओर
भटकते भटकते उन
गलियों में अब ये नज़र
बदनाम हो गयी।
फिर सूखे दरख्तों से
आवाज़ सी आती है
हवा की सरसराहट
कुछ गुनगुनाती है
फिर धडकनों की
गुज़रे ज़मानो से
पहचान हो गयी।
लिपट सी जाती हैं
तेरी यादें
नन्हें से बच्चे की तरह
हथेलियों को चूमती
आगोश में झूमती
फिर मेरी हसरतें तेरे नाम हो गयी।
खामोश रहके भी
कुछ बोल से जाते हो
पुराने लिखे वो ख़त
खोल से जाते हो
फिर सभी ख्वाहिशे
बेजुबान हो गयी।
पत्थरों में दबी आवाज़
आज भी सुनता रहता हूँ,
उस हंसी का सबब
आज भी बुनता रहता हूँ
फिर चादरों की
 सिलवटों से पहचान हो गयी।
जिन्दगी की शाम हो गयी।
 

मेरी आरज़ू है



मेरी आरज़ू  है
तू रहे रूबरू
यही जुस्तजू  है।
तेरी साँसों की
गर्मी रहे
तेरे चेहरे की नरमी
मिलती रहे
मेरी आरज़ू  है।
तेरे हर रंग को देखूं
तेरे हर ढ़ंग को देखू
तेरी ही ऊँगली थामे
बस चलता चलूँ
चलता चलूँ
मेरी आरजू है।
तेरे आंसूं चुरा लूँ
मुस्कुराहटे  बना दूँ ,
तेरे ही साए में
फिर एक जिन्दगी जी लूँ
मेरी आरजू है।
तेरी रौशनी में
अँधेरे छुपा दूँ
तेरी पलकों को चूम
मेरे इश्क का सूरज उगा दूँ
मेरी आरज़ू  है।
सर्दियों की रातों में
गुनगुने लम्हे बुनूँ
तेरी आगोश में पड़े
नीली चादरों पे छिटके
तारे चुनूँ
मेरी आरज़ू  है।
तेरी आँखों का भोलापन
तेरी शरारतें सभी
तेरी खिलखिलाहटे
समेट लूँ हथेलियों में अभी
मेरी आरजू है।
तेरी रूह की सादगी
तेरे इश्क की ताज़गी
अब है मेरी बंदगी
बस तेरी इबादत
में सजदा करूँ
मेरी आरज़ू  है।
कभी हथेलियों की हिना बनकर
कभी सुर्ख फूलों की दुआ बनकर
खुशबुएँ  बिखेरता रहूँ
मेरी आरज़ू  है
तू रहे रूबरू
यही जुस्तजू  है।

आलाप



सांझ ढले
गंगा तीरे
एक आलाप छेड़ा है जीवन का।
अब क्या रंग है
क्या गंध है
क्या द्वेष है,विद्वेष है
घुल गए अमृत सरीखे
स्वर सभी चहुओर,
चेतना के सोपान चढ़ते
एक आलाप छेड़ा है जीवन का।
आत्मा की थाप है
प्रीत का राग है
स्नेह का मृदंग है
बासुरी भी संग है
आस्था के सोपान चढ़ते
एक आलाप छेड़ा है जीवन का .... 

कैदी



एक जोड़ी आँखें
ढूढती  है एक टुकड़ा आसमाँ
जेल की चारदीवारों से परे
यही एक जोड़ी आँखे,
जिंदगी की बाट जोहती
बूढी बोझिल साँसे,
पेशानी की झुर्रियां
और चेहरे के स्याह घेरे ....
कदम उठते हैं चलते हैं
पर आगे बढ़ते ही नहीं
एक ठहरे पानी से शायद।
हथेलियों की तपिश
वही है मगर,
जताती है
चाह जीने की कही,
सिरहाने के कम्बल से
लगे कुछ ख्वाब
दबे पाँव आते हैं ....
सिलवटें पड़े होंठों पर
कहीं मुस्कान है शायद।

 

दलदल में फसे इंसान



चेहरे पर चेहरे की

दुशाला ओढ़े

औपचारिकताओ को बनाते हैं

विवशताये

दलदल में फसे इंसान .

गिरते हैं,फिसलते हैं

और धसते जाते हैं

तृष्णाओं के जाल में

लिपटते से जाते हैं।

अपरिमित इच्छाओं

की हवा में सांस लेते हैं

दलदल में फसे इंसान।

रिश्तों से परे गिरते हैं

दिए के तले  जलते  हैं,

अरमानों की ज़ंजीरों  में जकड़े हुए

बदलते परिदृश्य में

बदलते है चेहरों को

दलदल में फसे इंसान।

 

Tuesday, 5 February 2013

गुलाब की पंखुडियां

 



आज भी महकती हैं

तुम्हारे गुलाब की कलियाँ

मेरे अंतरंग में।

खुलती हथेलियों में

जब गुलाब की पंखुडियां

अलसाई सी आंख खोलती हैं

तब मदमाते, लहराते तुम आते हो।

हर सांझ

बनते हैं कई किरदार मेरी कल्पनाओं में

बनते हैं, बिगड़ते हैं

रह जाते हो तो तुम

और वही

तुम्हारी गुलाब की पंखुडियां...

अक्स

 


रिश्तों के

दरियों में

देखती हूँ

अपना

धुंधला

अक्स

पानी की पतली परत

के नीचे झिलमिलाते से बुलबुले

बनते हैं, बिगड़ते हैं

एक बार फिर,

लहरों के साथ

बह जाता है

मेरा धुंधला अक्स।

नारी मन

 


यथार्थ के धरातल पर विचरता

यह है भावनाओं का दर्पण
सुरभित, कुसुमित पुष्पों का तन

यह है नारी मन।
मानो एक अथाह सागर

कि जिसमें अगणित मोती

अनंत लहरें इतनी

ना नारी स्वयम जाने कितनी।

पल्लवित हो, मुखरित हो

सांझ का ढलकता आँचल

वात्सल्य रस के कुंड में

नहाकर जैसे अभी -अभी निकली हो।

प्रात की ममतामई भावना बदलती है
फिर सांझ के स्नेह्सिक्त दीये में।
कल्पना ,यथार्थ का संतुलन

सक्षम इतनी की जीते मृत्यु का गगन

यह है नारी मन।

डर


 


अनिर्णय

सी

स्थिति

में

परेशानियों

से

दूर भागते हुए

रात में उन

तारों के साथ

जलती हूँ,

सुबह से।

रात बिताती हूँ आँखें फाड़ कर

तकती हूँ शून्य को

और डरती हूँ

सुबह से।

जरुरत

 


कुर्सी पर टेक लेकर

पीछे झुकती हूँ

तो डर लगता है,

पता है कि दीवार है

सहारे के लिए

पर जरुरत है किसी

तीसरे हाथ की

मुझे थामने के लिए।

तुमने कुछ कहा

 


तन्हाई के गलियारों से

सांझ के बहते झरने से

घर लौटते पंछियों के

कलरव के बीच से

गुजरते हुए

हंसों सी सच्ची छलकती

मुस्कान में से,

क्षितिज के किनारे से होते हुए

छलकती, महकती, मदमाती

कुछ उलझती , कुछ सुलझती

हिम सी ठंडक हथेलियों में लिए

चंदन सी महक

चिड़ियों की चहक

लिए हरसिंगार के फूलों की

खुशबू के झोकें के

साथ अन्दर आकर

हलके से गाल थपथपाकर

बालों को ज़रा संवारकर

हौले से कान में तुमने कुछ कहा...
न रात है

न कुहासा है

कोई बुझा सवेरा भी नहीं

सांझ का अंतिम उजाला है शायद..

रिस-रिस कर दब जाती है

चाह कहीं मन में

कई गूंजती खामोशियाँ भी नहीं

नीले कांच से छलकती उदास चांदनी है शायद..

छाने हैं कई फलक

कई दर्रों में भटके

उजड़े काफिलों से बहार तक

टटोला है तुझे.

गीला-गीला सा लगता है

आसमाँ भी,

जाने नमी आसमाँ की है

या इन आँखों की अमानत है नमी.

बरसते बादल भी ढूंढ़ते हैं

मेरा वजूद,

इन्ही बूंदों में छिटक गया है शायद..

न रात है न कुहासा है

कोई बुझा सवेरा भी नहीं

सांझ का अंतिम उजाला है शायद..

इक रोज़


इक रोज़
इन गुलाबों
की महक
यूँ न होगी,
तेरी शोख हंसी
की खनक यूँ न होगी,
ख्वाब से भरे दो आँखों
की चमक यूँ न होगी,
तितलियों सा
रंग तेरा यूँ न होगा
तेरी मीठी बोली
की चहक यूँ न होगी
अल्हड इस
जवानी की
छनक यूँ न होगी.
स्याह से सफ़ेद
बालों का सफ़र
यहाँ होगा,
फिर चेहरे की झुर्रियों
से सामना होगा
और कदम कुछ सुस्त होंगे.
मगर उन झुर्रियों में भी
ये नूर होगा,
बूढी आँखों में भी
इस इश्क का
सुरूर होगा,
और सांझ ढले
हाथों में तेरा
हाथ होगा
और ये साथ
जन्मों का
साथ होगा....